Thursday, 19 February 2015

बातें बेमानी कहा करता हूँ

   बातें बेमानी कहा करता हूँ 
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    (लक्ष्य अंदाज़”)

तू हादसों में रंग भरता है मैं कहानी कहा करता हूँ !!
मैं शाम के सूरज की लाचार जवानी कहा करता हूँ !!

रात के आगोश में पिघली चांदी सा दमके वो बदन ,
मैं पारा पारा बिखर के अशा’र रूमानी कहा करता हूँ !!

तेरी हिना रची अंगुली से मेरे होठों की छुवन चुराई ,
मैं उस बद्तमीज़ हवा को भी सुहानी कहा करता हूँ !!

सहन में अब तेरी याद वाली हिचकियों का डेरा है ,
मैं हर शाम तुझे अश्कों की जुबानी कहा करता हूँ !!

मेरे सपनो की रेत में जो झील बन के ठहर गई ,
मैं अब उस नदी की बेख़ौफ़ रवानी कहा करता हूँ  !!

बागीचे देखने की ख्वाहिश में सूख गई आँखों से ,
मैं पतझर में जले जंगल की वीरानी कहा करता हूँ  !!

आओ कि, मेरी बैचैन साँसों का तिलिस्म तोड़ दो ,
मैं ‘अंदाज़’ की कलम से बातें बेमानी कहा करता हूँ  !!


(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA





तुम्हें याद होगा....

      तुम्हें याद होगा....
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अंजीर की कच्ची शाखों पर
उलटे लटके
किसी अनाम चिड़िया के
घोंसलों जैसे  
रुके हैं झोंके हवाओं के
रूठे हैं मौसम से
कि सहमे से हैं
मेरे पस्त हौसलों जैसे

दिन ये भी
बहुत खाली था
इम्तिहानों के बाद जैसा
कुणाली के सूखे फूलों वाली
तुम्हारे बंद हॉस्टल को जाती
उस सूनी सड़क जैसा

सुनो मित्ती,
बाँध ,पलाश और साँझ के
काफिए लौट रहे हैं
नज्मों में 
राह चलते पीछे से
कॉलर पकड़ कर 
कोई ले जा रहा है
बरसों पुराने उदास
नगमों में

आवारगी की डोर से
अब रातों चाँद को
बाँधने की साजिशें होंगी
तारों अटे आसमान में
ख्वाहिशों का क्या है मित्ती,
वो हैं , बस हैं ..
खवाहिशें ,फिर ख्वाहिशें रहेंगी !!


(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA



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Sunday, 15 February 2015

‘आप’ को ना आपा को

  ‘आप’ को ना आपा को
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पथरीले सपनों में फिर से
किसने बाग़ लगाया है !!
गाँव की गोरी को ठगने
फिर सन्यासी आया है !!


क्या ये कागा की चोरी है ,
या कोयल की मुँहजोरी है !
अमराई में कुहुक –कुहुक ,
खुद अपना पता बताया है !!


ये हर युग की सच्चाई है ,
बस चालाकी काम आई है !
आध:कुमारी वृंदा ने नकली ,
कान्हा संग ब्याह रचाया है !!



तुम शब्द-जाल में उलझ गए ,
तुम सब्ज़-बाग़ में सिमट गए !
जज़्बात की उडती आँधी में ,
फिर किसने नीड बनाया है !!


तुम मानो तो वह धोखा था,
ये पलट वार का मौका था !
तुम मौन रहे ना ,मुखर हुए ,
बस मेले में हाट लुटाया है !!


हम कहते हैं बस कहते हैं ,
पहचानी  पीड़ा सहते है !
समझ पाओ तो अच्छा है ,
यह प्रारब्ध है ,छल-माया है !!


पथरीले सपनों में फिर से
किसने बाग़ लगाया है !!
गाँव की गोरी को ठगने
फिर सन्यासी आया है !!


(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA





Saturday, 14 February 2015

चाँद रात है आज

 चाँद रात है आज
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मित्ती...

तुम्हें पता है

चाँद रात है ना आज


मुझे पता है 

आज की सांझ तुम

तुम सी ही अकेली छत पर

इंतज़ार कर रही होगी 

'किसी' का 

चाय पर और ,

यहाँ रेस्ट हाउस के सन्नाटों में 

बेकल हूँ मैं 

तुम्हारे पोशीदा बदन की रवायतों पर !


मित्ती....

चाँद रात है ना आज

तुम्हें पता है ना ...

आज रात जब

कोई माथा चूमेगा तुम्हारा 

वो होंठ गैर से लगेंगे तुम्हें
 
वो जब बढ़ेंगे 

तुम्हारो आँखों की जानिब

मेरी मुस्कुराती आँखे रोकेंगी उन्हें !


हाँ .. मित्ती

चाँद रात है आज

जाओ आज की रात के चाँद को देखो !!



(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA


आज फिर से , गुंजा ....

आज फिर से , गुंजा ....
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(लक्ष्य अंदाज़”)

आज फिर से
तेरा ख्याल आया
मौसमों पर
रंग–ऐ–जमाल आया

आसमानी आँचल से
महक सी उठी
तेरा चेहरा बन के
हिलाल आया

तेरे आने के ख्याल से
फाग गा रहा मन
तेरे शहर से ये उड़ता
मद भरा गुलाल आया

ये पलाशिया दुपहरी
बुला रही है तुझे
देख तेरे नाम से ही
मेरे फागुन में धमाल आया

सुर्ख गुलों में दबी आग से
हवाएं भी दहकती हैं
लचकती शाखें भी , तेरी
अंगड़ाईयों सी महकती हैं

अंदाज़ की सूनी आँखों में
आज फिर से
वस्ल का सवाल आया
आज फिर से
तेरा ख्याल आया !!

रंग–ऐ–जमाल= रंगों की ख़ूबसूरती
हिलाल=चाँद
वस्ल=मिलन


(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA


Thursday, 12 February 2015

मुकरने दो

मुकरने दो
किसी को
पारस पीपल बनने दो

पंछी लौटेंगे
फिर से
एक तिनका लिए
ठहर जायेंगे

‘मलिना’ के छतनार में
खिलते हुए फूल को
बिना छुए …….


(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA







अक्सर.....

अक्सर 
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तू अपनी आँखों में
अक्सर,

चाँद छिपाया करता था


हथेलियों की हिना में
दिन भर,

सूरज दमकाया  करता था


अपने पैरहन में जुदा रंग
भर कर ,

तू मौसम बतलाया करता था


जाने खुद से ही गया
या......
खुदा से गया
या ..... 
मेरे मौसम बदल गया





(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA