Friday, 4 September 2015

चाँद-रात उभास भरी (डॉ.लक्ष्मीकांत शर्मा )



चाँद-रात उभास भरी 

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ये चाँद-रात उभास भरी 

मेरे घर आँगन जब उतरी 


सहम गयी उदास भरी !!!


कि, कहीं मुस्कुराई तुम 


आँखों में चमके चन्द्र-फूल 


चाँदी सी बरस गयी हँसी 


उफ़!! ये कैसे हो गयी 


ये रात अब उजास भरी !!!



तुम चाँद काटने आओगी 


मैं पारस-चकवा बन बैठा 


उस पारिजात के गाछ तले 


मैं राग सुबह के गाता हूँ 


कर दूँगा रात विभास भरी !!!



तुम अब जो चेहरा देखोगी 


वो प्यार नहीं अधिकार है 


जिसे राहु-काल में ग्रहण लगा 


उस किस्मत का अँधियार है 


तुम आँख मूँद कर सोचो तो 


है ये पूजा भी आभास भरी !!!



हमने सुख के फूल सुखाये हैं 


और हार गूँथ लिए फंदों से

 
फिर खाप सरीखी दुनिया में 


अपने ही शव लटकाए हैं 


उस जन्म का जो वादा है 


जो तुमने मुझसे बाँधा है 


आओ उसको याद करो 


दो मुझे रात, विश्वास भरी !!!





……©2014. Dr.L.K.SHARMA

बिछडन के पार -II (डॉ.लक्ष्मीकांत शर्मा)


बिछडन के पार -II 
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पर सब बदल गया अब 

पैशन फ्लोरासी दर्पीली 

तुम्हारी ऑंखें 

जिनमे कभी काजल होता था 

मेरी नज्मों का

अब काले फ्रेम के चश्मे के पीछे 

एहसास दे रही थीं 

तुम्हारी ऑफिस वाली 

सरकारी फाइल्स के धूल अटे 

पन्नों का 

वक़्त अब हमारे बदन पर 

एक तहरीर लिख चुका था 

तुम्हारे काले क्लचरमें 

पके हुए रेशमीबाल फंसे थे 

मेरी कनपटियों से 

झाँकती 

सफेदी गवाह थी 

हमारे बुढ़ाते हुए 

अस्तित्व के अलग होने का 

सच 

उस रोज हम ऐसे मिले 

जैसे बरसों बाद 

कोई अपनी शादी का पुराना

एल्बम देखे 

या मिल जाएँ कहीं ठिठक कर 

दो एलियंस’ 

अनचाहे अनदेखे !!!




……© 2014Dr.L.K.SHARMA

बिछडन के पार -I(डॉ.लक्ष्मीकांत शर्मा )

बिछडन के पार -I
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किसी छोटी बच्ची सी ,

चहकती रही थीं ,

तुम 

बोलती रही थीं 

मेरे हाथों को 

वक़्त की तराजू बना 

बीते लम्हों को 

तौलती रही थीं 

बैठ कर ,उस रोज 

पार्क की उसी बेंच पर 

यहीं आते थे स्कूल से 

भागकर हम 

यहीं बैठकर 

टिफिन खाते थे हम 

यहीं पढ़ा करते थे हम 

विज्ञान की किताब के बीच 

छिपाकर, 

मिल्स एंड बूंसको घंटो तक 

इसलिए 

उस बिछडन के बाद 

पहली बार 

तुम्हे यहाँ बुलाया 

ताकि देख सकूँ 

कैसा लगता है उस 

तरुवर का गाछ ,

जिसका बीज कभी रोपा था 

यहीं सत्पत्ती की 

छतरी तले , 

अनजाने में !!


……© 2014Dr.L.K.SHARMA

गुंजा ,सुनो (डॉ.लक्ष्मीकांत शर्मा )

गुंजा ,सुनो 

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सुनो गुंजा, 

बहुत भाते हैं मुझे ,

बंधन नेह के !!

आत्मा से गूंजते 

प्रीत निवेदन देह के 

अयाचित से अनुबंध 

सुलगती रेत पर बरसते मेह के !!

सुनो गुंजा, 

रास आते हैं मुझे ,

विरह से व्यथित 

ऊँचे सुरों के आलाप 

कुछ मिलन गीत !!

भूले से कुछ सम्बन्ध 

एक नयी नवेली सी शरमाई प्रीत !!

सुनो गुंजा, 

पास बुलाते हैं मुझे ,

समंदर यादों के 

बेदर्दी से रौंदे हुए 

मौसम, इरादों के !!

पतझर में रंग बदलते 

बहरे ख्वाब अमलतासिये वादों के !!



……© 2014Dr.L.K.SHARMA

रौस आइलैंड से (डॉ.लक्ष्मीकांत शर्मा)

 रौस आइलैंड से 

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मैंने यूँ ही सोचा तुम्हें ,

 
काले पानी से भरे थाल जैसे 


दरिया के किनारे ,


यूँ ही बैठे हुए 


कुछ उनीदीं सी, थकी हुई 


चट्टानों के सहारे !!

मैंने यूँ ही सोचा तुम्हें


तेज़ हवाओं से उठती लहरें 


देख रहा हूँ मैं , गोया 


अल्फाज़ हों ये ,तुम्हारी 


किसी ताज़ा नज़्म जैसे


सहला रहे हों


वक़्त की बेरहम छैनी से 


छिली हुई मेरे बदन की 


इमारत के ज़ख्म जैसे !! 

मैंने यूँ ही सोचा तुम्हें


समन्दर के ऊपर गुजरते 


हवाई-जहाज़ से उड़ते हुए 


एक बेहद अकेली हो चली 


सांझ में, तुम्हारी छत पर


ध्रुव-तारे को उगते हुए !!


मैंने यूँ ही सोचा तुम्हें


कि कुछ ही देर में जब 


काले बादलों को चीर कर 


आसमान में चाँद निकलेगा 


तुम्हारी जुल्फों के बीच से 


तुम्हारा चेहरा 


दिए की रौशनी में चमकेगा !!



मैंने यूँ ही सोचा तुम्हें


और जब आधी रात को 


वो ही चाँद 


पानी में डूब-उतरेगा

गहरी नींदों के बीच 


तुम्हारी घनेरी अलकों को छूता हुआ 


वो माथे पर टिकुली सा दमकेगा !!



मित्ती,


इसी रात तुम्हारी छत पर टँगी 


सहमी सी इस बदली से 


मैं अपने प्यार को जता दूँगा ,


जब तुम अपनी तारों वाली चुनर 


आँखों पर ढाँप कर मुझे आवाज़ दोगी 


मैं तुम्हे इस ज़जीरेका पता दूँगा !!

मैंने यूँ ही सोचा तुम्हें ,


बस मैंने यूँ ही सोचा तुम्हें !!




……© 2014Dr.L.K.SHARMA