Thursday, 28 May 2015

मेरे देस की रेत से

मेरे देस की रेत से ......
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गरम हवा टनकारों से रात भर रात लड़ी !!

पस्त सी अलस भोर देर तलक सोई पड़ी !!


तन फव्वारा बना मन वणजारों सा भटके ,

मेरे देस की रेत से भर गई सूखी बावड़ी !!


सूरजमुखी दाग लिए दोपहरी के चेहरे से ,

ठूंठ पड़े उस नीम की निंबोली प्रीत लड़ी !!


नगन लाज़ते परबतों ने बादलों को टेर दी,

पानी दे दो ओढने को हरीभरी इक पातडी !!


डामर पिघली सडक पे बैठ सांझ ने सोचा ,

कितने पंछी मर गए अमराई में सून पड़ी !!




(डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015 Dr.L.K. SHARMA








Wednesday, 27 May 2015

बातें बेमानी कहा करता हूँ

         
        
बातें बेमानी कहा करता हूँ !
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(लक्ष्य अंदाज़”)          

तू हादसों में रंग भरता है मैं कहानी कहा करता हूँ !!

मैं शाम के सूरज की लाचार जवानी कहा करता हूँ !!


रात के आगोश में पिघली चांदी सा दमके वो बदन ,

मैं पारा पारा बिखर के अशा’र रूमानी कहा करता हूँ !!


तेरी हिना रची अंगुली से मेरे होठों की छुवन चुराई ,

मैं उस बद्तमीज़ हवा को भी सुहानी कहा करता हूँ !!


सहन में अब तेरी याद वाली हिचकियों का डेरा है ,

मैं हर शाम तुझे अश्कों की जुबानी कहा करता हूँ !!


मेरे सपनो की रेत में जो झील बन के ठहर गई ,

मैं अब उस नदी की बेख़ौफ़ रवानी कहा करता हूँ  !!


बागीचे देखने की ख्वाहिश में सूख गई आँखों से ,

मैं पतझर में जले जंगल की वीरानी कहा करता हूँ  !!


आओ कि, मेरी बैचैन साँसों का तिलिस्म तोड़ दो ,

मैं ‘अंदाज़’ की कलम से बातें बेमानी कहा करता हूँ  !!



……©2014 “ANDAZ-E-BYAAN” Dr.L.K.SHARMA



आखिरी अंदाज

आखिरी अंदाज
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(लक्ष्य “अंदाज़”)

यह घट बढ़ चाँद की जो हालत हुई !!
उस पर  गोया इश्क की इनायत हुई !!

उन बिल्लौरी आँखों में नहीं देखते हैं ,
एक अरसा हुए आईनों से नफरत हुई !!

अजनबी सी भीड़ में मेरे नबी खो गए ,
पहले भी कई बार मुझे ये वहशत हुई !!

इश्क के गली में बंद मकानों के आगे ,
दम तोड़ गए मुसाफिर की मैय्यत हुई !!

परिंदे की चहक को खता समझने वालों ,
कब से तुम को  गुलों से मुहब्बत हुई !!

मधु चखना है तो हाथों के डंक न गिन ,
कामयाबियां तो हासिल बा मशक्कत हुई !!

हम तो आसमाँ  को घर करने चल पड़े,
पैरों तले जमीं खिसकी तो कयामत हुई !!

खूंरेज लफ्जों को कागज़ पर उतार कर ,
सोचता है ‘अंदाज़’ ये ग़ज़ल की सूरत हुई !!



 (डॉ.एल.के.शर्मा)
……© 2015
“ANDAZ-E-BYAAN” Dr.L.K. SHARMA

Tuesday, 26 May 2015

अब के, सावन

अब के, सावन
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अब के सावन यूँ करें ,
इस कुदरत को मनाएं !!
तुम भीगी बदली सी बरसो ,
ह्म जलता वन बन जाएं !!

बचपन के उस खेल को ,
चल , फिर से आजमाएं  !!
आह ! तुमको दें आवाज़ ,
हम ,दूर कहीं छिप जाएं  !!

गाँव के पोखर में फिर ,
नीली मछलियों को ढूंढें !!
बाँध किनारे बीजें फूल ,
पीली तितलियाँ उगाएँ !!

खुले आसमाँ के नीचे ,
रात खाट  पर लेटें !!
जलते बुझते जुगनुओं को
कोई गीत नया सुनाएं !!

रात का सुरमा आँखों में
और , तारों की माला
चाँद को पीछे से पकड़ें ,
इक चन्द्रहार पहनाएँ !!

बैठ खेत की मेंड पर ,
पग पानी में डाले !!
बादलों पर नाम तुम्हारा ,
लिक्खें और मिटाएं  !!

चूल्हे आगे बैठी हो तुम,
रोटी महकी शाम  !!
दिप-दिप करते चेहरे को ,
जी भर नज़र लगाएं !!

वक़्त के सूखे चिथड़े को ,
फटी पतंग सा फेंक !!
बोझिल दिन को विदा करें
चिड़ियों सा सो जाएं !!


(photo courtsy: Google)
लक्ष्य "अंदाज़" 
 ……©2015 Dr.L.K.SHARMA




Friday, 10 April 2015

नदी है वो , सोचती सी

नदी है वो ,सोचती सी 
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वो नदी है ,

पयस्विनी
गहरी ,खामोश और उद्दाम
क्षितिज के प्रतिबिम्ब को घेरे
कभी विलुप्त ना होने के संकल्प के साथ !!
कल-कल बहने लगेगी तीव्र अविरल धार के साथ !!


वो गीत है ,

रागमालिका….
ठुमरी, दादरा और तराना
कीर्तन की सी पावनता समेटे
निश्शब्द चीड-बन में पंचम स्वर लगाते हुए !!
प्रतिध्वनित होगी कभी बागेश्री का श्रृंगार गाते हुए !!


वो रंग है ,

इन्द्रधनुषी….
कंगन ,मेहँदी और चित्रकारित
नाचते मोर के पंखो को रंग बांटते
इन नीरव काली रातों में सपन भिगोती सी !!
महकी सुबह के नारंगी सूरज को हाथों में संजोती सी !!


वो फूल है,

सूरजमुखी…..
महुवा ,सुपर्णा और सोनजूही
हवाओं में पावन सुगंध भरते
बादलों में बीजेगी गंधमादन की केसर क्यारियाँ !!
मन-मरुस्थल में खिल उठेंगी अनगिनत फुलवारियां !!



हाँ ,वो प्यास है

शाश्वती….
पीर ,ताप और अज्ञात
नित नए यायावरी आयामों को छानती
खिलखिलाएगी कभीकविता बनकर महक उठेगी !!
गुडहल सी सुर्ख आँखों में चैतीपलाश सी चहक उठेगी !!


हाँ प्रेम है वो,

मनुहारिणी….
मधुबन ,चन्दन और समर्पण
काजरी चितवन के मोह-पाश से मन बांधती
रंगहीन बसंत के लिए अमलतासिये रंग चुराएगी !!
रेगिस्तान के वितान कैनवास पर मोतियों से तारे सजाएगी !!


(डॉ.एल. के.शर्मा)

……©2015 Dr.L.K.SHARMA

Wednesday, 1 April 2015

ऐत्तन्निमित

 ऐत्तन्निमित
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( 1 )
उतरती सर्दी की
सूनी सी दुपहरी में
जलबंध किनारे
कीकर की डालियों से
छनकर आती धूप
बरस दर बरस
छीज रही उम्र सी
मद्दम पड़ती रौशनी
( 2 )
सम्प्रवर्तित हवाओं में
आक्षेपों के पंख लिए
तैरते हैं संदेह के
सिद्धदोष बीज
कीकर की कोटरों में
छिपी कमेडी सा
बोलता है वक़्त
( 3 )
छलना के गर्भ में
पाखंड के पार्थ से सुना
अधूरा युद्ध-कौशल
आखिर दंडादिष्ट हुआ    
ऐत्तन्निमित चक्रव्यूह में
एक और अभिमन्यु का
अभित्रासित अंत हुआ
( 4 )
भग्न किले पास से
शहर से दूर जाती
इस सड़क से
कहते हैं जो गया
फिर नहीं लौटा
जैसे जीवन की
इस आपाधापी में
मेरी कई कवितायें
रूठ कर गईं
तुम्हारी तरह ......

(डॉ.एल.के.शर्मा) 
……©2015  Dr.L.K.SHARMA


‘अंदाज़’ जरा बदले हैं


      'अंदाज़' जरा बदले हैं 
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       (लक्ष्य अंदाज़”)

अब दूर से गाते हैं , आवाज़ जरा बदले हैं !!
काफिर ने इबादत के अंदाज़जरा बदले हैं !!

तुम ढूंढते हो मुझमें, सादा दिली के नगमें,
अब भी वही लिखता हूँ अल्फाज जरा बदले हैं !!

यह जुर्म नहीं है मेरा उन पंछियों से पूछो
जिनको पर नए हैं परवाज़ जरा बदले हैं !!

वो बेकसी की रुत थी यह दीद की गुजारिश
नज्मात वही हैं जानम आगाज़ जरा बदले हैं !!

उन चश्मे-चिरांगा से मैं खुद को जला बैठा ,
झुलसी हुई डाली के अरबाज़ जरा बदले हैं  !!

यह जंगे-इश्काँ है कितकदीर से ठनी है ,
घोड़े नहीं हैं बदले , शाहबाज़ जरा बदले हैं !!

अब दूर से गाते हैं , आवाज़ जरा बदले हैं !!
काफिर ने इबादत के अंदाज़जरा बदले हैं !!


(डॉ.एल.के.शर्मा)

 ……©2015 “ANDAZ-E-BYAAN”Dr.L.K.SHARMA